Jhalawar School Accident Teacher’s Letter To The Society : झालावाड़ स्कूल हादसे पर समाज के नाम शिक्षक को खुला पत्र

Jhalawar school accident Teacher’s Letter To The Society : मैं एक शिक्षक हूं — वह अंतिम कतार में खड़ा व्यक्ति, जिस पर किसी भी दुर्घटना के बाद सबसे पहले उंगली उठाई जाती है। चाहे भवन गिरे, दीवार ढहे या मासूम जानें जाएं -जिम्मेदार ठहराया जाता है उसी व्यक्ति को जो कक्षा में चॉक पकड़कर भविष्य गढ़ता है।

Jhalawar School Accident Teacher's Letter To The Society : झालावाड़ स्कूल हादसे पर समाज के नाम  शिक्षक को खुला पत्र
Jhalawar School Accident Teacher’s Letter To The Society

हर सरकारी निर्माण कार्य में सबसे पहले तय होती है हिस्सेदारी, ना कि गुणवत्ता। चाहे वह स्कूल की इमारत हो, सड़क हो या शौचालय — सबसे पहले तय होता है कौन कितना कमाएगा, फिर चाहे निर्माण खोखला, अस्थिर और असुरक्षित क्यों न हो।

ठेकेदार का मुनाफा, अभियंता की आंख मूंद लेना, विभागीय मंजूरी, और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी — इन सबसे मिलकर बनता है एक ऐसा भवन जो केवल कागज़ पर टिकाऊ होता है, हकीकत में वह किसी भी दिन कब्रगाह में बदल सकता है।

जब निर्माण पूरा होता है, तो NOC मिल जाती है। लेकिन जब छत गिरती है, जब मासूमों की सांसें मलबे में दब जाती हैं, तो मीडिया, समाज और सिस्टम केवल एक ही आवाज़ लगाते हैं — “शिक्षक दोषी है!”

लेकिन सवाल ये है:

क्या टेंडर पास करने की शक्ति शिक्षक के पास थी?
ईंट और सीमेंट की गुणवत्ता क्या शिक्षक ने जांची थी?
क्या निरीक्षण रिपोर्ट पर शिक्षक के हस्ताक्षर थे?

उत्तर स्पष्ट है — नहीं।

फिर भी हर बार जांच रिपोर्ट में लिखा जाता है:
“प्राथमिक दृष्टया शिक्षक की लापरवाही प्रतीत होती है।”
यह अन्याय नहीं, एक सामूहिक संवेदनहीनता है।

इसलिए आज मैं कोई बहाना नहीं बना रहा,
बल्कि एक विनती कर रहा हूं:
जैसे निर्माण में हिस्सेदारी तय होती है,
वैसे ही मौत की हिस्सेदारी भी तय कीजिए।

शिक्षक के सवाल

ठेकेदार कितना दोषी?
अभियंता ने निरीक्षण क्यों नहीं किया?
विभाग और पंचायत ने कार्रवाई क्यों नहीं की?

और शिक्षक…
वह तो बस एक ज्ञानदाता है,
एक सच्चा संरक्षक,
जो बच्चों को पढ़ाने आया था,
ना कि शव गिनने या कफन संभालने।

Jhalawar School Accident Teacher’s Letter To The Society

समाज से मेरी प्रार्थना है —
शिक्षक को बार-बार बलि का बकरा मत बनाइए।
उसे दोष नहीं, संरक्षण और समर्थन दीजिए।
भाषणों से नहीं, मजबूत भवनों और ईमानदार नीतियों से शिक्षा को सुरक्षित कीजिए।

वरना वो दिन दूर नहीं जब
शिक्षक टिफिन के साथ-साथ संजीवनी और स्ट्रेचर लेकर स्कूल आएंगे,
क्योंकि अब स्कूल भवनों पर भरोसा नहीं रहा।

यह सिर्फ एक शिक्षक की आवाज नहीं है,
बल्कि पूरे शिक्षा-तंत्र की आत्मा का करुण क्रंदन है।
कृपया इसे सुनिए,
इससे पहले कि अगली छत फिर किसी सपने को तोड़ दे,
किसी मां की गोद सूनी कर दे।

Leave a Comment

WhatsApp Icon